
दीवार में एक खिड़की रहती थी by विनोद कुमार शुक्ल
दीवार में एक खिड़की रहती थी – विनोद कुमार शुक्ल
पुस्तक समीक्षा: श्रीकान्त पांडेय, सितम्बर - २०२६, गुरूग्राम
गत वर्ष २३ दिसंबर को रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान (AIIMS) में विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन के पश्चात्, उनकी श्रद्धांजलि स्वरूप लिखे गए कुछ लेखों को पढ़कर मुझे उनकी कृतियों से लाभान्वित होने की तीव्र इच्छा हुई। वर्तमान हिंदी साहित्य के प्रति अपनी असंगत, बेबुनियाद अवधारणाओं और पूर्वाग्रहों के कारण जिन कुछ असाधारण लेखकों से मैं दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से वंचित रहा, उनमें विनोद जी के प्रति जो कशिश मेरे भीतर जगी, उसका प्रायश्चित हमेशा कम ही रहेगा। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' को पढ़ना उसी मलाल का सुखद परिणाम बना—एक ऐसा मलाल, जिसका पठन-पाठन के संदर्भ में मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से कोई दूसरा उदाहरण नहीं है।
प्रसिद्ध हिंदी कथाकार और कवि विनोद कुमार शुक्ल जी को ५९वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे छत्तीसगढ़ के पहले और हिंदी साहित्य के १२वें ऐसे रचनाकार हैं जिन्हें इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया है। उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में 'नौकर की कमीज' और 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' प्रमुख हैं। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के लिए उन्हें पूर्व में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है। उन्हें पेन/नाबोकोव (PEN/Nabokov) अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (२०२३) से भी सम्मानित किया जा चुका है।

"दीवार में एक खिड़की रहती थी" को विनोद कुमार शुक्ल की सबसे महत्वपूर्ण और सर्वश्रेष्ठ रचना माना जाता है। इसी विचार के साथ, मैंने उनके साहित्य की यात्रा की शुरुआत इसी उपन्यास से करना उचित समझा। मैंने इसे सितंबर २०२६ के मध्य में पढ़ना शुरू किया था और लगभग एक सप्ताह के भीतर इसे पूरा कर लिया। यह कहना कि मैं इस रचना से बेहद प्रभावित हूँ, बहुत छोटी बात होगी; और वहीं दूसरी ओर, इसकी प्रशंसा में भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग करना व्यर्थ और सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा। फिर भी, अपनी आदत के अनुसार, मैं इस पुस्तक पर अपने प्रभाव, अपने अनुभवों और 'जादुई यथार्थवाद' (मैजिकल रियलिज्म)—जिस विधा से यह उपन्यास ताल्लुक रखता है—से जुड़े अपने विस्तृत विचारों को कलमबद्ध करना अपना कर्तव्य समझता हूँ।

साधारणता में छुपा असाधारण जादू
विनोद कुमार शुक्ल जी का यह उपन्यास हिंदी साहित्य में जादुई यथार्थवाद (Magical Realism) का एक बेजोड़ उदाहरण है। शुक्ल जी का जादू किसी भव्य फैंटेसी से नहीं, बल्कि एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के अत्यंत साधारण और रोज़मर्रा के जीवन से पैदा होता है। २४३ पृष्ठों के इस उपन्यास के केंद्र में एक क़स्बाई नवदंपती है—रघुवर प्रसाद (जो क़स्बे के महाविद्यालय में गणित के २३ वर्षीय व्याख्याता हैं, बेहद साधारण, जिनके जीवन में कोई 'गणित' नहीं है) और उनकी नवोढ़ा पत्नी सोनसी।
महाविद्यालय से आठ किलोमीटर दूर स्थित उनके एक कमरे के किराये के मकान की दीवार में मौजूद खिड़की सिर्फ हवा और रोशनी का जरिया नहीं है, बल्कि वह एक असीम और जादुई मानसिक संसार का द्वार बन जाती है। इस खिड़की को फाँदकर रघुवर प्रसाद और सोनसी नदी, तालाब, चट्टान, तोतों, नीलकंठों और पहाड़ियों के एक ऐसे गीतात्मक, स्वप्निल संसार में प्रवेश करते हैं जहाँ कपड़े धोना, नहाना, सो जाना और प्रेम कर पाना भी संभव है।
इस जादुई दुनिया में एक चायवाली बुढ़िया है—अम्मा, जो बेख़बर सोए लोगों को उठाती भी है, चाय भी पिलाती है और सोनसी को सोने के कीमती कड़े भी देती है। साथ ही, अपने साधु के साथ नियमित आता हाथी सिर्फ़ आने-जाने का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य और पशु के बीच एक अनिर्वचनीय आत्मीय रिश्ते का जादुई रूपक बन जाता है। ठीक इसी तरह, अपने पिता की मार के डर से दिनभर पेड़ की फुनगी पर छिपा रहने वाला लड़का और उसकी चिंता में घुली माँ, कस्बाई जीवन के सहज डर, मासूमियत और सुरक्षा की तलाश को उजागर करते हैं। और सोनसी अक्सर उसे ऐसी ममतामयी करुणा के साथ खिलाती है जो केवल एक माँ में ही हो सकती है; वह अक्सर अपने हिस्से का भोजन भी उसे दे देती है और खुद केवल तभी खाती है जब उसे भरपेट खिला लेती है।
उपन्यास में संबंधों की आत्मीयता के दो ऐसे रूप मिलते हैं जो पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं को बिना किसी शोर के नया अर्थ देते हैं। पहला, सोनसी और उसकी सास का रिश्ता—जहाँ कोई biological माँ-बेटी का संबंध न होते हुए भी एक अगाध, निश्छल स्त्री-स्नेह है। सोनसी का अपनी सास से उनके बचपन, बाल-विवाह और असमय गुजर गई रघुवर की बड़ी बहन के बारे में पूछना दो स्त्रियों के साझा सुख-दुख का मर्मस्पर्शी चित्र प्रस्तुत करता है। दूसरा, रघुवर प्रसाद और सोनसी का एक-दूसरे को बिना किसी औपचारिक 'आप' या कृत्रिम आदर के केवल 'तुम' कहकर पुकारना। यह 'तुम' किसी परंपरागत सोपानिकी (hierarchy) या पूज्य-भाव के स्थान पर दोनों के मध्य एक सहज, आत्मीय और समतावादी प्रेम को स्थापित करता है।प्रदर्शनवाद से बचते हुए इसमे शुक्ल जी ने ऐंद्रिका, माँसलता, रति और शृंगार के भी ऐसे चित्र दिए हैं जो बग़ैर उत्तेजक हुए आत्मा को इस आदिम संबंध के सौंदर्य से समृद्ध करते हैं, एक नितांत ही स्वाभाविक तरीक़े से।
खिड़की के पीछे की यह दुनिया रघुवर प्रसाद के विभागाध्यक्ष को कभी दिखाई नहीं देती, जबकि प्राचार्य केवल चोरी गई साइकिलों और चपरासियों की व्यवस्था में ही उलझे रहते हैं।
उपन्यास में कोई महान घटना, कोई विराट संघर्ष या संदेश नहीं है; इसमें बस वह जीवन है जो इस देश की साझी संवेदना है। यहाँ न नायक है, न नायिका और न ही खलनायक। विनोद जी इस साधारण जीवन में बहुत गहरे पैठकर दांपत्य, परिवार और आस-पड़ोस के रिश्तों के ज़रिए अदम्य आस्था स्थापित करते हैं।
वैश्विक जादुई यथार्थवाद से भिन्नता
जादुई यथार्थवाद का मेरे लिए हमेशा एक विशेष आकर्षण रहा है और मैंने गेब्रियल गार्सिया मार्केज़, सलमान रुश्दी तथा हारुकी मुराकामी को बेहद पसंद किया है। किंतु विनोद कुमार शुक्ल जी का जादुई यथार्थवाद इन सभी से सर्वथा भिन्न है:
गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ (One Hundred Years of Solitude) का जादू अत्यंत भव्य, अतिप्राकृतिक और राजनीतिक-ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़ा होता है। इसके विपरीत, विनोद जी का जादू 'घरेलू और अत्यंत सूक्ष्म' है। यहाँ रोज़मर्रा की साधारण चीज़ें (बिस्तर, बर्तन, खिड़की) सजीव होकर मानवीय संवेदनाएँ साझा करने लगती हैं। मार्केज़ का जादू चौंकता है, जबकि शुक्ल जी का जादू जीवन की सादगी में विस्मय जगाता है।
हारुकी मुराकामी (Kafka on the Shore) का जादू अकेलेपन, अवसाद और महानगरीय अलगाव (Alienation) से उपजता है। शुक्ल जी के यहाँ भी अकेलापन और मासूमियत है, लेकिन उसमें मुराकामी जैसा कोई अंधकार या मनोवैज्ञानिक जटिलता नहीं है। शुक्ल जी का संसार आत्मीयता, संकोच और भारतीय कस्बों के सह-अस्तित्व से भरा है, जो पाठक को अवसाद नहीं, सुकून देता है।
सलमान रुश्दी (Midnight's Children) जादुई यथार्थवाद का उपयोग तीखे व्यंग्य और राजनीतिक बयानों के लिए करते हैं। इसके विपरीत, विनोद जी बहुत धीमे, शांत और मौन तरीके से व्यवस्था की विसंगतियों को सामने लाते हैं। उनके यहाँ जादुई तत्व जीवन के अभावों को सहनीय और सुंदर बनाने के लिए आते हैं।
रेणु और विनोद कुमार शुक्ल: प्रकृति का सजीव रूप
समकालिक हिंदी उपन्यासों में 'मैला आँचल', 'सूरज का सातवाँ घोड़ा', 'शेखर: एक जीवनी' और 'राग दरबारी' के बाद यह उपन्यास मेरे लिए पाँचवीं महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ।
फणीश्वर नाथ 'रेणु' जी के 'मैला आँचल' और विनोद जी के इस उपन्यास में प्रकृति को एक सजीव पात्र के रूप में देखना एक साझा पूँजी है। 'मैला आँचल' में कमला नदी, ताड़ के पेड़ और कास के फूल गाँव के सुख-दुख को जीते हैं। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में भी तालाब, पेड़, चंद्रमा और अँधेरा जड़ वस्तुएँ नहीं हैं—वे रघुवर प्रसाद और सोनसी के संवादों में तीसरे व्यक्ति की तरह शामिल रहते हैं।
दोनों लेखकों के पास प्रकृति को देखने की एक 'शिशु-सुलभ मासूमियत' है। अंतर केवल कैनवास का है—रेणु जी का कैनवास विशाल और अंचलाधारित है, जबकि शुक्ल जी का कैनवास अत्यंत घरेलू और सूक्ष्म। वे एक छोटे से कमरे और अहाते में ही पूरे ब्रह्मांड की जीवंतता को समेट लेते हैं।
यह मासूमियत अज्ञान या अपरिपक्वता नहीं, बल्कि बहुत कुछ जान लेने के बाद भी आश्चर्य करने की क्षमता बचाए रखने का नाम है। रेणु के यहाँ यह दृष्टि लोकजीवन और मिट्टी से जुड़ी हुई है। 'मैला आँचल' में प्रकृति मनुष्य से अलग कोई सजावटी पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि गाँव के जीवन, उसकी स्मृतियों, लोक-विश्वासों और रोजमर्रा की संवेदनाओं का अभिन्न हिस्सा है। उनकी आँख परिचित पेड़, तालाब या सुबह को भी इस तरह देखती है कि उसमें जीवन की सहजता और ताजगी बनी रहती है।
विनोद कुमार शुक्ल में यही मासूमियत अधिक निजी, कल्पनाशील और स्वप्न-जैसी हो जाती है। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में खिड़की स्वयं एक सुंदर रूपक बन जाती है—सीमित घरेलू संसार के भीतर से असीम आकाश, पेड़ों, पक्षियों और तारों को देखने का रास्ता। जहाँ वयस्क मन वस्तुओं को उनकी उपयोगिता से पहचानता है, वहाँ उनकी दृष्टि उन्हें फिर से आश्चर्य में बदल देती है।
इस अर्थ में रेणु और विनोद कुमार शुक्ल दोनों हमें कोई नया संसार नहीं देते; वे इसी परिचित संसार को फिर से देखने की आँख देते हैं। परन्तु, एक बात मुझे विशेष रूप से उल्लेखनीय लगती है: रेणु के यहाँ प्रकृति के प्रति यह मासूमियत "लोक" से आती है, जबकि विनोद कुमार शुक्ल के यहाँ वह "कल्पना" से। इसलिए दोनों को केवल "प्रकृति-प्रेमी" लेखक कहना उनके अंतर को बहुत छोटा कर देगा। रेणु प्रकृति को जीए हुए संसार के रूप में देखते हैं; विनोद कुमार शुक्ल उसे फिर से खोजे गए संसार के रूप में। यही दोनों के बीच का सबसे रोचक साहित्यिक संवाद है।
विनोद कुमार शुक्ल जी की भाषा अत्यंत शांत, मितभाषी (Minimalist) और सरल है। वे बहुत छोटे वाक्यों में गहरा दर्शन कह जाते हैं और गद्य को कविता के करीब ले आते हैं। मुझे यह पूर्वाभास हो रहा है कि यह उपन्यास न केवल इस वर्ष मेरी पढ़ी गई किताबों में सबसे बेहतरीन साबित होगा, बल्कि हिंदी साहित्य के मेरे अध्ययन में एक मील का पत्थर भी बनेगा।
उपन्यास का हर अनुच्छेद उद्धृत करने योग्य है, पर इसके कुछ अध्यायों के शीर्षक ही अपने आप में मुकम्मल कविताएँ हैं:
हाथी आगे-आगे निकलता जाता था और पीछे हाथी की ख़ाली जगह छूटती जाती थी।
दृष्टि के जल से सूर्य चंद्रमा हो गया था। और अल्पना का बना हुआ कमल पानी में तैर रहा था।
दोनों जागे थे। और सबकुछ नींद में झूम रहा था। तालाब नींद में तालाब था। आकाश नींद का आकाश था।
पेड़ों के हरहराने की आवाज़ में चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ बैठी थी।
रात के बीतने से जाता हुआ अंधेरा शायद हाथी के आकार में छूट गया था। ज्यों-ज्यों सुबह होगी हाथी के आकार का अंधेरा हाथी के आकार की सुबह होकर बाक़ी सुबह में घुलमिल जाएगा।
रातभर अंधेरे का इतना साथ था कि दिन का उजाला बहुत उजाला लग रहा था। लगा कि एक सूर्य से इतना उजाला नहीं हो सकता, दो सूर्य होंगे।



