Shrikant Pandey
Cover of प्रारम्भिकी - रामधारी सिंह ‘दिनकर’

प्रारम्भिकी - रामधारी सिंह ‘दिनकर’ by अनिल राय

Book Review· September 30, 2026 · 798 words

श्रीकान्त पांडेय

मूल प्रकाशन तिथि: मार्च २०२२ (फेसबुक)

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के वरिष्ठ अध्यापक एवं हमारे आत्मीय संबंधी श्री अनिल राय (मौसा जी) की यह पुस्तक प्रकाशित हुई और हमने पूरी तत्परता के साथ इसे प्राप्त भी किया। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, इसे पढ़ने का प्रयोजन तुरंत नहीं हो पाया। गत दो सप्ताह में इस त्रुटि का निवारण करने के उपरांत अपने यथाशक्ति विचार रखने की धृष्टता कर रहा हूँ।

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दिनकर जी से मेरा परिचय और 'उर्वशी' का सौंदर्य

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर उन चुनिंदा हिन्दी कवियों में हैं जिनसे आज की पीढ़ी भी अनभिज्ञ नहीं है; हालाँकि ज्यादातर लोग उन्हें 'रश्मिरथी' और 'कुरुक्षेत्र' के ओजस्वी कवि के तौर पर ही जानते हैं। हिन्दी साहित्य में अभिरुचि होने के बावजूद अंग्रेजी साहित्य की तुलना में हिन्दी साहित्य से मेरा परिचय काफी सीमित रहा है और यह मेरे लिए एक खेदपूर्ण विडंबना है। फिर भी मुझे रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र एवं उर्वशी पढ़ने का हर्ष प्राप्त हुआ है और ये तीनों ही मुझे बहुत प्रिय रही हैं। उर्वशी, जिसके लिए दिनकर जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था, मुझे बाकी दोनों की अपेक्षा थोड़ी मुश्किल प्रतीत हुई थी।

इस सहज और जानकारी से परिपूर्ण 'प्रारम्भिकी' को पढ़ने के बाद एक बार पुनः दिनकर जी की कविताओं को पढ़ने का प्रोत्साहन मिला है। उर्वशी को लेकर मुक्तिबोध और नामवर सिंह की तीखी आलोचना मुझे पूरी तरह स्वीकार्य नहीं लगती। अनुराग, प्रेम, प्रणय, जिम्मेदारी, दया और करुणा जैसी मानवीय संवेदनाओं का जो चित्रण दिनकर ने उर्वशी में किया है, उसकी मिसाल हिन्दी साहित्य में जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' के अतिरिक्त बहुत कम मिलती है।

जीवन-संघर्ष और सामाजिक चेतना

सात अध्यायों में विभाजित यह किताब दिनकर जी की समस्त रचनाओं के आलोचनात्मक अध्ययन की एक सार्थक कोशिश है। हर अध्याय अपने आप में एक पूर्ण निबंध है। पहले अध्याय से दिनकर जी की व्यक्तिगत और पारिवारिक स्थिति का एक संक्षिप्त परिचय मिलता है। परिवार के प्रति दायित्व-बोध, जीविका के लिए नौकरी करने की बाध्यता और स्वतंत्रता संग्राम की तत्कालीन परिस्थितियों के बीच इतनी उत्कृष्ट कविताओं की रचना कर पाना दिनकर जी की असाधारण विद्वता और मानसिक शक्ति का प्रमाण है।

लेखक का यह कहना कि दिनकर जी की कविता में जो ओज, पौरुष, आवेग और संघर्ष दिखाई पड़ता है, वह उनके व्यक्तित्व का भी अनिवार्य हिस्सा था, सर्वथा सही प्रतीत होता है।

दूसरा अध्याय दिनकर जी की रचनात्मक प्रेरणा के बारे में है। उनकी कविताओं में अपनी सांस्कृतिक परंपरा के प्रति आदर एवं अभिमान तो है ही, आधुनिक विचारों के प्रति स्वीकार्यता भी है। इसका प्रमाण रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र और 'परशुराम की प्रतीक्षा' हैं, जो मूलतः महाभारत और भारतीय पौराणिक परंपरा से प्रेरित होने के बावजूद अपने समय के समसामयिक प्रश्नों को संबोधित करती हैं।

छायावाद, प्रगतिवाद और दिनकर की सहजता

दिनकर जी को छायावाद और प्रगतिवाद के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। प्रगतिवादी कविताएँ बहुत बड़ी संख्या में आज के सामान्य पाठकों द्वारा नहीं पढ़ी जातीं और छायावाद अपनी भाषा व प्रतीकात्मकता के कारण कठिन प्रतीत होता है। महादेवी वर्मा, पंत, निराला और जयशंकर प्रसाद को समझना आम पाठक के लिए हमेशा आसान नहीं है।

यद्यपि दिनकर जी समकालीन राजनीतिक सवालों के प्रति उदासीन नहीं थे, फिर भी उनकी कविताएँ उतनी प्रत्यक्ष और आक्रामक नहीं हैं जितनी उग्रता अन्य राजनीतिक कवियों की रचनाओं में दिखती है। छायावादी और उग्र राजनीतिक-प्रगतिवादी दोनों ही धाराओं के विपरीत दिनकर की कविताएँ ज़्यादा सहज, सुगम और सुलभ प्रतीत होती हैं।

शायद यही उनकी लोकप्रियता का एक कारण भी है। उनकी कविता में विचार और भाव दोनों हैं, लेकिन भाषा पाठक को अपने से दूर नहीं करती।

गद्य-साहित्य और भावी संकल्प

अध्याय सात दिनकर जी की गद्य रचनाओं के ऊपर है। उनकी साहित्यिक आलोचना वाले निबंध मेरी अभिरुचि के बाहर हैं, परंतु 'संस्कृति के चार अध्याय' को इतिहास-लेखन के क्षेत्र में दिनकर जी का विशिष्ट योगदान माना जाता है। इसे पढ़ने की अभिलाषा, जो काफी दिनों से रही है, इस समीक्षा को पढ़ने के बाद काफी दृढ़ हो गयी है।

हिन्दी साहित्य और खासकर दिनकर-साहित्य के प्रेमियों के लिए यह किताब एक महत्वपूर्ण अध्ययन है। मेरे जैसे पाठक के लिए, जिसकी हिन्दी साहित्य में रुचि तो है लेकिन अध्ययन व्यापक नहीं रहा, यह पुस्तक एक उपयोगी प्रवेश-द्वार की तरह लगी।

एक व्यक्तिगत स्वीकारोक्ति

हिन्दी में लिखने की आदत न रहने से मैं अपने भावों के साथ और 

इस किताब के साथ न्याय कर पाने में असमर्थ महसूस कर रहा हूँ।

अपनी मातृभाषा में अपने को अभिव्यक्त न कर पाना अत्यंत क्षोभ

और ग्लानि की बात है। अपनी इस त्रुटि के लिए सभी से और

विशेष रूप से इस उत्तम समालोचना के लेखक, श्री अनिल राय जी से, 

करबद्ध क्षमाप्रार्थी हूँ।

(अगर आपने यह पुस्तक पढ़ी है या दिनकर जी के साहित्य में आपकी रुचि है, तो नीचे टिप्पणी (Comments) में अपने विचार ज़रूर साझा करें!)

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