Shrikant Pandey
Cover of Lapoojhanna । लपूझन्ना (Hindi Edition)

Lapoojhanna । लपूझन्ना (Hindi Edition) by Ashok Pande

Book Review· February 6, 2026 · ★★★★

We could never loved the earth so well if we had no childhood in it. ~ George Eliot

लप्पूझन्ना : अशोक पांडे

एक प्रिय मित्र की अनुशंसा पर—और जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में पुस्तक प्राप्त होने के बाद—मैंने बीते सप्ताहांत अशोक पाण्डेय के उपन्यास लप्पू‑झन्ना का पाठ पूरा किया। शीर्षक‑शब्द “लप्पू‑झन्ना” उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश) की बोलचाल में प्रचलित एक अनौपचारिक अभिव्यक्ति है, जिसका संकेत उन व्यक्तियों की ओर होता है जिन्हें कमज़ोर, ढीले‑ढाले या गंभीरता से न लिए जाने योग्य समझा जाता है—यद्यपि बिहार‑झारखंड जैसे प्रदेशों में इसकी प्रचलिति अपेक्षाकृत कम ही है। कृति प्रथम पुरुष में लिखी गई है और कथावाचक का नाम लेखक के नाम से मेल खाता है; इसी से इसका स्वर पारंपरिक उपन्यास की अपेक्षा बचपन की स्मृतियों का आत्मीय संस्मरण अधिक बन पड़ता है। कथा‑समय 1975–1977 का है—जब कथावाचक लगभग दस‑ग्यारह वर्ष का है—और स्थान रामनगर; प्रत्येक अध्याय उस उम्र की किसी पृथक घटना का जीवंत झरोखा है। पुस्तक की अधिकांश घटनाएँ हास्य‑रस से पुलकित हैं और पढ़ते हुए पाठक अनायास ही खिल उठता है। लेखक का जन्म नवंबर 1966 में हुआ और मैं उनसे ठीक दो वर्ष छोटा हूँ; इसलिए उस दौर की हिंदी फ़िल्मों और आपातकाल (1975–77) के वातावरण के अनेक संदर्भ मेरे भीतर भी स्मृति की गूंज बनकर उठते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ठेठ लोकबोलियों में लिखा गया गद्य सहज, सरस और चलताऊ‑सी फुर्ती लिए है; कई संवाद‑स्थितियाँ इतनी दिलचस्प और मूर्खा‑मिश्रित हैं कि खिलखिला उठना स्वाभाविक हो जाता है।

सबसे दीप्तिमान पात्र है लफ्तू—कथावाचक का प्रिय, भीतर से अत्यंत संवेदनशील पर बाहर से उद्दंड‑उच्छृंखल मित्र। उसकी तुतलाहट‑भरी बेबाक बोली, चोरी की आदत, पढ़ाई से अरुचि, बड़ों के प्रति निर्भय‑अवज्ञा, शोले सिनेमा के संवादों का अकिंचन‑सा पर असरदार शौक़, और गालियों के चुलबुले, कभी‑कभी चमत्कारिक प्रयोग—इन सबके बावजूद वह अविस्मरणीय, स्नेहसिक्त और मनुष्यत्व से भरापूरा लगता है। निस्संदेह वह कथा का ‘किंगपिन’ है—पर अकेला नहीं: लाल सिंह, बंटू और फुच्छी जैसे चरित्र भी अपने‑अपने ढंग से रेखांकित रहते हैं। फिर भी, लफ्तू पुस्तक की आत्मा है—राह भटकता‑सा, पर सोने‑सा दिल लिए; बाह्यतः शोरगुल‑भरा, भीतर से विश्वासयोग्य और कोमल।

कृति में मुरादाबाद, काशीपुर, मेरठ और रामनगर के ठेठ बोलचाल के मुहावरे बार‑बार उभरते हैं। मेरा बचपन रांची में बीता; अतः कई अभिव्यक्तियाँ परिचित होते हुए भी उतनी आत्मीय न लगीं—पर पश्चिमी यूपी या हरियाणा के पाठकों को यह भाषा निश्चय ही घर‑सी प्रतीत होगी। विद्यालय‑जीवन का चित्रण यहाँ बड़ी प्रामाणिकता और विनोदी कटाक्ष के साथ आता है—छोटे कस्बे का प्राथमिक स्कूल, जहाँ विद्यार्थी उद्दंड हैं, शिक्षक उनसे भी अधिक; अनुशासन मानो किसी लोककथा का पात्र हो, उपस्थित नहीं। पढ़ाई न छात्रों की प्राथमिकता है, न शिक्षकों की—और इसी अराजक, पर जीवन्त आलोक में कस्बाई जीवन अपनी सच्ची धड़कन के साथ दर्ज होता है। बार‑बार लौटने वाले दो स्थल विशेष रूप से याद रह जाते हैं—सिनेमा हॉल के पास स्थित बौन्ना की जर्जर दुकान, जहाँ अशोक और लफ्तू बम‑पकौड़ा चट कर जाते हैं; और पास ही लाल सिंह की चाय‑दूकान, जहाँ उनसे कुछ बड़ा लाल सिंह दो नटखटों पर अपना अपनापा उँडेलता है। बम‑पकौड़े का ज़िक्र आते ही मैं अपने किशोर दिनों में लौट गया—रांची के एचईसी टाउनशिप के झोपड़ी मार्केट और सेक्टर‑2 में समोसा (हमारे यहाँ ‘सिंघाड़ा’) और प्याज़‑पकौड़ी का स्वाद जैसे जीभ पर फिर खिल उठा।

मैं शिशु विद्या मंदिर जैसे अनुशासनप्रिय और संस्कृतनिष्ठ हिंदी के आग्रह वाले विद्यालय में पढ़ा हूँ; इसीलिए पुस्तक के अनेक वाक्य‑प्रयोग मुझे कुछ खुरदरे और चुभन‑भरे प्रतीत हुए। फिर भी, पाठानुभव अत्यंत सुखद रहा—अपने ही बचपन, अपने संगी‑साथियों और उन निखालिस दिनों की गलियों में फिर घूमने का अवसर मिला। लेखक किशोरवय की सहज आकर्षण‑भावनाओं (समवयस्क, कभी‑कभी थोड़ी बड़ी लड़कियों की ओर) को भी विनोद और आत्मीयता के साथ स्थान देता है—पचास के उत्तरार्ध में खड़े पाठक को भले यह बालसुलभ लगे, पर इसकी प्रसन्न लहरें हँसा भी देती हैं और छू भी जाती हैं।

एक और प्रसंग जिसने मुझे सुखद आश्चर्य से भर दिया और मुझे कक्षा पाँच से सात के दिनों की अत्यंत आत्मीय स्मृतियों में लौटा दिया, वह था पुस्तक के एक अध्याय में “राजन–इक़बाल” जासूसी उपन्यासों का संक्षिप्त‑सा उल्लेख। इस श्रृंखला से मैं इस कदर जुड़ा हुआ था कि महीने में दो‑तीन उपन्यास पढ़ डालना सामान्य बात थी—कुछ सीमित जेब‑ख़र्च से ख़रीदे जाते, कुछ उधार लिए जाते और कुछ आपसी अदला‑बदली से जुटाए जाते। राजन और इक़बाल जैसे किशोर जासूसों द्वारा अंजाम दी जाने वाली असंभव‑सी लगने वाली गुप्तचर कार्रवाइयों को पढ़ने में जो संतोष मिलता था, उसकी बराबरी कोई और आनंद नहीं कर पाता था। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि घर में इस तरह का पठन न तो प्रोत्साहित किया जाता था और न ही सहन। बार‑बार की चेतावनियों के बावजूद जब मुझ पर कोई असर नहीं हुआ, तो कई पुस्तकों को निर्दयता से फाड़ दिया गया—मानो वही अनुशासन का अंतिम उपाय हो। इसके बावजूद, आज भी मैं राजन‑इक़बाल श्रृंखला और रायदादा की राम‑रहीम शृंखला को बड़े स्नेह और कृतज्ञता के साथ याद करता हूँ। अब यह स्पष्ट होता है कि वही छोटी‑छोटी पुस्तकें मेरे भीतर पुस्तकों के प्रति स्थायी प्रेम का बीज बो गई थीं। मेरे लिए राजन‑इक़बाल ने वही भूमिका निभाई, जो अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़े अनेक विद्यार्थियों के लिए हार्डी बॉयज़ ने निभाई।

लप्पूझन्ना पढ़ते समय जागृत हुई अधिकांश स्मृतियाँ सुखद थीं—पर सभी नहीं। पुस्तक में शिक्षकों को अकसर निरीह छात्रों पर ज़रा‑सी बात पर निर्दय पिटाई करते हुए दिखाया गया है, और ऐसे कई प्रसंग अत्यंत सजीवता से वर्णित हैं। जब‑जब मैं ऐसे अंश पढ़ता, एक पुरानी स्मृति के कारण भीतर तक सिहर उठता। पाँचवीं कक्षा की बात है। हमारे विज्ञान के शिक्षक थे—मनोज बनर्जी गुरुजी—करीब पच्चीस वर्ष के, तेज‑तर्रार और प्रभावशाली व्यक्तित्व के युवक। अपने अधिकांश छात्र जीवन में—प्राथमिक से लेकर माध्यमिक स्तर तक—मैं शिक्षकों पर कम और स्वाध्याय पर अधिक निर्भर रहा हूँ। एक दिन, जब वे वनस्पति विज्ञान से जुड़ा कोई पाठ पढ़ा रहे थे, मैं अपने ही विचारों में डूबा हुआ था। अनजाने में मैंने अपनी फ़ाउंटेन पेन की ढक्कन से हवा फूँकनी शुरू कर दी, जिससे सीटी जैसी आवाज़ निकल रही थी। उन्होंने कुछ क्षण तक मुझे देखा, फिर मुझे खड़ा होने को कहा और साथ‑साथ एक अन्य छात्र को निर्देश दिया कि वह मैदान से बेहया के पौधे की कुछ मजबूत टहनियाँ ले आए—जो वहाँ प्रचुर मात्रा में उगता था। टहनियाँ आते ही उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया—इतनी देर तक कि सारी टहनियाँ टूट गईं—और मुझे तब तक यह भी समझ नहीं आया था कि मेरा अपराध क्या है। बाद में बताया गया कि कक्षा में सीटी बजाना अक्षम्य अपराध था, क्योंकि वहाँ लड़कियाँ भी थीं और इसे उनके प्रति उद्दंडता माना गया। उस समय मैं मात्र नौ वर्ष का था—कक्षा का शायद सबसे छोटा छात्र—और ऐसी किसी व्याख्या से सर्वथा अनभिज्ञ। स्तब्ध और भयभीत अवस्था में जब मैं घर पहुँचा, तो तेज़ बुख़ार चढ़ चुका था, पर माता‑पिता को सच बताने का साहस नहीं जुटा पाया। उस घटना के बाद मैंने शिक्षकों से यथासंभव दूरी बनाए रखने की कोशिश की। आत्म‑रक्षा की यह अवचेतन प्रवृत्ति मेरे साथ इंजीनियरिंग कॉलेज तक बनी रही—हालाँकि इस बीच मुझे कई अच्छे और संवेदनशील शिक्षक भी मिले। आज भी किसी शिक्षक के सामने खड़ा होना मुझे असहज कर देता है। बचपन का एक अकेला, किंतु गहरा आघात जीवन भर के व्यवहार और मनोवृत्ति को किस तरह आकार दे सकता है—यह उसका प्रमाण है।

मेरी एक छोटी‑सी आपत्ति भाषा की अतिरंजित उद्दंडता को लेकर है। लड़का‑लड़की के स्थान पर लौंडा‑लौंडिया जैसे शब्द पश्चिमी यूपी की बोलचाल में सामान्य हैं, पर बार‑बार का प्रयोग कुछ असहजता ला देता है। इसके अतिरिक्त च—या, ह—मी जैसे सपाट अशिष्ट पद और लड़कियों के लिए माल जैसा संबोधन—ये सब मुझे टाले जा सकने योग्य लगे। मेरा मानना है, संस्मरण का असर भाषा की करकशता पर नहीं, संवेदना की सच्चाई पर टिका होता है; अतः संयत शब्दावली भी समान रूप से प्रभावकारी हो सकती है। बचपन की स्मृति‑यात्रा पर मेरे प्रिय पठनों में मार्क ट्वेन की द एडवेंचर्स ऑफ़ हकलबेरी फ़िन और टॉम सॉयर, तथा रस्किन बॉन्ड की अनेक रचनाएँ शामिल हैं—जिनमें अपने‑अपने भूगोल‑समाज का बाल्यकाल अद्भुत प्रामाणिकता और संयत भाषा के साथ उभरता है। हालाँकि यह आपत्ति अल्प है। जो मुझे खटका, वही अन्य पाठक को और अधिक यथार्थपरक व रसपूर्ण प्रतीत हो सकता है।

समग्रतः लप्पू‑झन्ना एक उत्तम, मनोरंजक और स्मृतिप्रधान कृति है—जिसकी मैं निस्संकोच अनुशंसा करता हूँ। इसे पढ़िए—अच्छा लगेगा। मैं तो अपने दो मित्रों के लिए इसकी दो प्रतियाँ मँगा चुका हूँ; विश्वास है, वे इसे मेरे ही समान स्नेह से पढ़ेंगे।

और अंत में, जो पंक्ति मेरे संग सबसे देर तक ठहरी, वह है लफ्तू का अपनी विशिष्ट तुतलाती ज़ुबान में बोला संवाद—

“जो दल गया, बेते - वो मल गया”